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Thursday, November 03, 2022

दुविधा - २

जाने ऐसी क्या हो गयी है बात,
जो बाहर ना कुछ आहट होती है;
दिन से लगता है शायद अब हो गयी रात,
छिपी कमरे में, वह सोचती है, रोती है।

जब वह इस कमरे में आयी थी,
तब अंधेरे से उसकी ना ये लड़ाई थी; 
और आसान लगा था यूँही छिप जाना,
ध्येय था तो बस सखी को देख चिल्लाना।

पर, फिर समय की गुलेल कुछ लम्बी खिंची,
उसके अधपके दर की क्यारियाँ, उसकी दुविधाओं ने सिंची;
"क्या छिपी रहूँ यूँही, चुपचाप, इस बिस्तर के नीचे,
या कर साहस भाग चलूँ बाहर, अपनी प्रिय सखी के पीछे?"

अब तो सन्नाटा भी गहराता चला है,
संग साहस और संकल्प भी ठहराता चला है;
याद आता है तो बस सुनी उन कहानियों का डर,
जहां बिस्तर के नीचे होता था काले भूतों का घर।

शायद वो भी लुका छिपी खेल रहे हैं मुझसे,
धप्पा बोलने को, यहीं कहीं ताक में खड़े हैं कबसे;
अब तो सखी की पुकार ही लगती, मेरा एकमात्र सहारा है,
पानी तो ठहरा, भले ही अंततः निकल जाए खारा है।

बरसों से खेल यह सब खेल रहे हैं, 
और यह खेल अनवरत जारी है;
मुखौटे ही बस बदल रहें हैं,
आज हमारी, तो कल निकल जाये किसी और की बारी है।।

Wednesday, September 21, 2011

इक पेड़ का मंथन

हा! काटो, एक और सही, की हैं शाखाएँ अभी और भीं
सह लेना बस थोड़ा, की है खुद ही खुद को सताने का दौर भी |
जलाएगा सूरज तुम्हे कुछ और, तो क्या?
जलाती तो है तुम्हे इर्ष्या और बदले की आग भी |
माना होगी हवा कुछ कम, तड़प लेना जरा
आखिर तड़पते हो फंसे, अपनी तन्हाईयों औ चाहतों के जाल में भीं |
ना पंछियों की कोलाहल, ना कोयल रूपी जीवन की कूक होगी,
पर शायद बहरे हो! अपनी छोड़ सुनते ही हो कौनसी आवाज़ दूसरी अब भी?
दौड़ो...! पर थकोगे, आज या कल -- कभी तो तुम -- या शायद नहीं 
की मशीनी सी हो गयी है ये आगे बढ़ने की तुम्हारी दौड़ भी |
हमारा क्या है, सिमट जायेंगे इस जहाँ से हम, पर तुम्हे क्या? 
शायद हमारे जाने के बाद, हैं जीने के तुम्हारे सहारे कई और भीं |

Friday, September 03, 2010

दुविधा


दरवाजे पर खड़ी चिंतन में,
सहमी, सकुचाती इक बाला;
विस्तृत होता अन्धकार है,
बहती दुविधा की अविरल धारा |
अन्दर शायद सखी छुपी है,
खेल हो रहा लुका छिपी का;
ढूँढना उसकी लाचारी है,
वरना यह खेल अधूरा है |
"पर क्या अन्दर दीपक जलता है;
या यह रात अमावास है?
भीतर जाकर देख पाने का
साहस क्या उसके पास है?"
अगर वो अन्दर जाती है,
और छुपी सखी उसे मिल पाती है;
तो वे लौट के घर जायेंगी, 
और अँधेरे के दूतों को, हा हा करके चिढायेंगी |
पर अगर अँधेरे ने दबोच लिया, 
और आशाओं का आँचल नोच लिया, 
तब क्या ये साहस रह पायेगा?
या उसके आसुंओं में, तिनका तक भी बह जायेगा?
इतने तक तो तब भी ठीक है,
क्यूंकि सखी का साथ अभी बाकी है;
पर आँकों तुम मूल्य इस खेल का,
गर जो सखी ने साहस छोड़ दिया... |